शनिवार, 23 नवंबर 2013
दो दीवारें !!
रविवार, 15 जुलाई 2012
" जिद "
"
जिद "
किसी
रात की तरह फिर से आज
चुपचाप
चाँद पर जाने की जिद की...
ना जाने
क्यों चाहा की सारे तारे जकड़ लाऊं
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमां लांघ जाऊं !!!
[इस पंक्ति से क्षितिज़
के छोर तक जाने की की कल्पना देखिये]
एक
गरम हवा हर बार, हथेली इस कदर छूती रही
नीचे
सिमटा दिखा सब कुछ ..ज़मीं हर पहर हिलती रही
बादल
भी कई चेहरों से ढकने लगा मुझे कुछ यूँ देखकर,
आखिर
एक नया मुखौटा लग गया एक नयी दुनिया में जाने को...
कोई
पहचान ना पाए चेहरों से..हर चेहरा इतना बदल आऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
बारिश
कैसे होती है सब पूछते थे मुझसे घर पर ...
आज
उन बूंदों को उनके घर से निकलते हुये देखा था मैंने...
रहता
था जहाँ, वहां प्यास में हर तलाश भी बेपता थी...
प्यासे
घरों की कितनी छतें बारिश में ढहती देखी थी मैंने...
उन
घरों का अँधेरा देख लगा कि चलो कुछ घर रोशन कर आऊं..
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
[रिश्तो के मायने कैसे
है हर जगह इन चार लाइनों में देखिये]
कितने
खुश है लोग...शायद ख़ुशी जानते ही नही...
वो
(ज़मीं) दूर होकर भी अम्बर से खुश हुआ करती है....
यहाँ
कोई "मै" नही कहता....कोई "तुम" नही कहता....
वहां
तो हर दूरी भी एक रिश्ता बना जाती है...
कुछ
पल और दे दो...मै सबको एक रिश्ते में बाँध आऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
[ये अगली पंक्ति
कल्पना के अंतिम चरण की है, ज़रा गौर करियेगा]
सोयी
रात ने फिर आँख मली एक करवट लेकर
पानी
के छीटें डाले हैं अभी अभी किसी ने मुझ पर
ताज़ी
ओस वो खुशबू मेरे पास आकर रुक गयी....
तैयार
हो रहा था चाय वाला चूल्हा जलने को ..
मैंने
सोचा इस नीद से इस तरह मै कैसे अभी जाग जाऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
"
जिद "
किसी
रात की तरह फिर से आज
चुपचाप
चाँद पर जाने की जिद की...
ना जाने
क्यों चाहा की सारे तारे जकड़ लाऊं
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमां लांघ जाऊं !!!
[इस पंक्ति से क्षितिज़
के छोर तक जाने की की कल्पना देखिये]
एक
गरम हवा हर बार, हथेली इस कदर छूती रही
नीचे
सिमटा दिखा सब कुछ ..ज़मीं हर पहर हिलती रही
बादल
भी कई चेहरों से ढकने लगा मुझे कुछ यूँ देखकर,
आखिर
एक नया मुखौटा लग गया एक नयी दुनिया में जाने को...
कोई
पहचान ना पाए चेहरों से..हर चेहरा इतना बदल आऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
बारिश
कैसे होती है सब पूछते थे मुझसे घर पर ...
आज
उन बूंदों को उनके घर से निकलते हुये देखा था मैंने...
रहता
था जहाँ, वहां प्यास में हर तलाश भी बेपता थी...
प्यासे
घरों की कितनी छतें बारिश में ढहती देखी थी मैंने...
उन
घरों का अँधेरा देख लगा कि चलो कुछ घर रोशन कर आऊं..
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
[रिश्तो के मायने कैसे
है हर जगह इन चार लाइनों में देखिये]
कितने
खुश है लोग...शायद ख़ुशी जानते ही नही...
वो
(ज़मीं) दूर होकर भी अम्बर से खुश हुआ करती है....
यहाँ
कोई "मै" नही कहता....कोई "तुम" नही कहता....
वहां
तो हर दूरी भी एक रिश्ता बना जाती है...
कुछ
पल और दे दो...मै सबको एक रिश्ते में बाँध आऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
[ये अगली पंक्ति
कल्पना के अंतिम चरण की है, ज़रा गौर करियेगा]
सोयी
रात ने फिर आँख मली एक करवट लेकर
पानी
के छीटें डाले हैं अभी अभी किसी ने मुझ पर
ताज़ी
ओस वो खुशबू मेरे पास आकर रुक गयी....
तैयार
हो रहा था चाय वाला चूल्हा जलने को ..
मैंने
सोचा इस नीद से इस तरह मै कैसे अभी जाग जाऊं...
आज
बस एक आखिरी सांस लूं और ये आसमा लांघ जाऊं...!!!
मंगलवार, 26 जून 2012
" बेफिक्र "
सोमवार, 18 जून 2012
"मर्जी"
सवालों में उलझी जिंदगी एक पतंग बन गयी...
बहकना कहाँ है अब तुझे ऐ रात
बीत जाना अपनी मर्जी से...
रहने भी दो अब आसमानों वाली बात !!!
कुतरे कागजों के ढेर से..
उठता धुंआ ना जाने किधर जायेगा..
किसी के घुंघराले बालों से निकलकर
तिनका शायद कही और लिपट जायेगा..
बसना कहाँ है अब तुम्हे ऐ ख़यालात
सीख जाना अपनी मर्जी से...
रहने भी दो अब आसमानों वाली बात !!!
घर में पड़े उन रिश्तों का क्या होगा...
एक पुलिंदा फिर अब टूट जायेगा...
कुछ नमकीन से साँसों में होगे..
कुछ धूमिल आँखों के आगे होगे..
आजमाना कहाँ है अब तुम्हे ऐ वाकयात
भीग जाना अपनी मर्जी से...
रहने भी दो अब आसमानों वाली बात !!!
सोमवार, 4 जून 2012
"अनसुना"
मै चुप रहूँ , कुछ कहूँ, सुनना जैसे.... कहीं अपनी बात क्यूँ नही?
कदमो से घर के अन्दर, फासला अब भी उतना ही है..
दूरियों के पुल पर हमदर्दी का कोई दरवाजा बना दो...
चलता है, बसर है, रुकना जैसे.... कहीं कोई ठौर क्यूँ नही ?
ये तो मिट्टी के खिलौने, ज़रा बारिश आने का इंतज़ार हो..
चल ओ ग़मगीन आसमां..ऊपर ही ऊपर कहीं तो तकरार कर लो ..
तपिश है,लहर है, बहना जैसे....कही कोई हमसाया क्यूँ नही?
रख ताक पर ...रिश्तों का कोई मेल, नही "मोल" ...ऐसा ही है..
बेवज़ह इस किनारे ....उस किनारे ...किनारा अब तक ऐसा ही है..
जीतना है,हराना है, समझना जैसे...कही कोई आवाज़ क्यूँ नही ?????
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012
"धुंध"

ख्वाबों का उतरना बाकी था,
शुक्रवार, 18 नवंबर 2011
"चाहूँ कभी"

चाहूँ कभी बचपन की वो यादें, पुरानी खरीद लू मै,
या जवानी की वो बहकती, चंचल रूमानी खरीद लू मै,
वो एहसास, वो दरियादिली की, तुमको लगे कभी प्यास तो,
जिस्म का कतरा कतरा लहू बेच, सब पानी खरीद लू मै
मिलता था सुकूं दिल को ,था वचपन मेँ गुमां जिसपर ,
वो खिलौने, गुड्डे-गुडिया साथ रानी खरीद लूँ मैँ ।
जो हसती थी मेरी अम्मा ,था बाबूजी का झूठा रुठना ,
वो झगड़े, वो कट्टिस, बेवक्त शैतानी खरीद लूँ मैँ । ।
काश इक बार फिर से गुजरें वो बसंत की बहारें,
तो पतझड़ की सारी जवानी खरीद लूं मैं !!!!
सोचता हूँ कभी क्षितिज के हर छोर पर जाकर
गर बचपन लौट आये, दादी नानी की सारी कहानी खरीद लू मै, !
तू रहता है सामने तो इबादत सी चलती है साथ,
तू न हो कभी परेशां, अल्लाह की सारी मेहरबानी खरीद लू मै !
आइना क्या बताता मुझे तेरे चेहरे की कभी कोई मासूमियत
तेरे लबों की उस नाजुकी के लिए, फूलों से नूरानी खरीद लू मै!!
चलना मुझे भी था हर कदम साथ, हमदम बनकर तुम्हारा
रास्ते रुके ना कभी मंजिलों से पहले , नदियों की रवानी खरीद लू मै !
इतने परिचय देकर संतोष कहाँ है "आशुतोष"
रिक्त बीती है कितनी रातें, इक रात कोई पुरानी खरीद लू मै,
कोई भला क्यूँ पहरा करता तुम्हे यूँ नज़रबंद करके
तुम सदा होशमंद रहो, दुनिया से सारी बदगुमानी खरीद लू मै !
ना रहा कोई सिलसिला तुझसे दूर जाने का कभी
मैंने भी करवटों से छुपकर तारे देखे हैं
नूर चेहरे का परदे में तेरा कब तक रहेगा अब...
तू कहे तो फिर से, एक जवानी खरीद लू मैं....!!




