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Friday, December 17, 2010

दुविधा


दुविधा है की सिर्फ तुम हो इस पार,
क्यूंकि उस पार सरगम का कोई साज़ नहीं था ...
दिन ढलने से पहले ही आज ओढ़ ली थी मैंने चादर,
मग़र इस सर्द रात का मेरे लिए कोई अहसास नहीं था !!!
मशक्कत से रोटी के लिए पैसे जुटाए थे,
मग़र क़स्बे में खुली आज कोई दुकान नही थी ...
मंहगाई की मार से जीवित रह तो गए ,
पर ज़िंदा जज्बातों में आज कोई जान नही थी ...
सुर की साधना, पुष्प की अभिलाषा करते
आज हम ना जाने कितने बड़े हो गए...
ज़ईफ़ ऐनकों से वही चेहरे ना जाने कितनी दूर
और दूर के चेहरे आज कितने पास हो गए !!
रात को नींद ना आने का कारण डॉक्टर ने बताया तो था,
फिर भी उन अनजाने चेहरों के पीछे
सात दिन तक आँखे ना खुली ,
अरबा में पड़ी गंगाजल की शीशी
के भी ख़तम हो चुके थे छीटें !!!
कुछ वाकयात बाहर के थे कुछ घर के अन्दर ही
दुविधा की पेटी में साँस लेते बैठे थे..
कुछ सुना तो पन्त जी की इकलौती बेटी की
चर्चा करते कुछ लोग आगन में बैठे थे...
"होना क्या था" को लेकर इतनी बड़ी बहस मैंने
शायद ही कभी देखी थी टूटे झरोखों से ...
अम्मा को भी फकत की फुर्सत थी खानसामे से,
कि इस बहस में भिड़ती रोज के लोगों से......
मुन्ना (बड़के का बेटा ) अपनी थाली में
गरम रोटी के इंतज़ार में अम्मा के पास दो घंटे से बैठा रहा....
और अम्मा का चूल्हा रात के नौ बजे तक
गीली लकड़ियों से सुन-सुन कर जलता रहा.......
अपने पैरों के अभाव में खटिया पर
मेरे शरीर का विस्तार दो साल से कुछ कम सा था ...
वैद्य की खुराक,पत्तियों के लेप और
मेरी पत्नी की दुआ का असर ही एक मरहम सा था....
बबलू को २ साल का होता देख लगा कि
मेरे पैरों का असर अब इतना बेअसर नहीं रहा....
फिर भी उसे अपनी गोद में लेकर चलने का सबब,
अंतर्मन में वर्तमान से जूझता रहा !!
खर्चन की लकड़ी को अरहरे से तोड़
मुन्ना गाली देता हुआ जब अन्दर तक जाता था,
वक़्त फिर से मुझे उस दुविधा के मोड़ पर
तन्हा छोड़ दिल को छलनी कर जाता था...
मेरे कुछ अंतिम सवाल होकर भी मुझे सबके जवाबों की
एक लम्बी फेहरिस्त बनानी पड़ती थी..
अपने पैंतीस साल के अहसास को लेकर
घर में ही कितनी शिकस्त खानी पड़ती थी......
बड़के की दूसरी शादी पर अम्मा को
शायद ही कभी इतना रोना आया था ....
पट्टेदारों से सुना था कि इस बार भी बड़के के घर
ना के बराबर "सोना" आया था......
अम्मा गृहस्ती में सुलगकर पेंशन से
घर चलाने की ज़द्दोज़हद में लगी है.......
मुझे याद है मेरी शादी के बक्से में
उसकी दी हुई "मोहर" आज भी रखी है.....
अम्मा बड़के के पीछे निराधार जब कुछ कहती है
तो रो पड़ता हूँ मैं भी चादर के नीचे..
अस्तित्व के सहारे जब उठना नहीं होता
तो देखता हूँ अपनी बैसाखियों को नीचे....
कुंठित मन से शालीनता का आँचल फैलाकर
अम्मा आज भी व्यस्त रहती है.....
मेरे साथ हुए हादसे को भूल कर वो आज भी
मेरे सोने के बाद रोया करती है...
दिन-रात का अंतर महसूस नहीं कर पाता
तो अम्मा को बुला लेता हूँ.......
इस दुविधा में अपने आगे का जीवन भी मैं आज
अपनी अम्मा को समर्पित करता हूँ.......













--
**cheers**
Ajay Gautam
9313077477